लाइफ स्टाइल: मायके से ससुराल तक रिश्ते
मायके की चौखट से ससुराल की दहलीज तक: रिश्ते जोड़ने सलाह दें, फैसले नहीं: चंद्रकांति आर्य
05 सितंबर 2026, Tropic Reporters, चंद्रकांति आर्य, भोपाल:
परिवार केवल चार दीवारों और कुछ लोगों का नाम नहीं है। परिवार वह जगह है, जहां इंसान अपने सुख-दुख बांटता है, अपनापन महसूस करता है और जीवन की मुश्किल घड़ियों में सहारा पाता है। यही कारण है कि हर व्यक्ति के जीवन में परिवार का महत्व सबसे अलग और विशेष होता है। समय बदल रहा है। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवार ले रहे हैं। जीवन की रफ्तार बढ़ गई है और लोगों के पास एक-दूसरे के लिए समय कम होता जा रहा है। ऐसे समय में रिश्तों को बनाए रखने के लिए पहले से कहीं अधिक समझ, धैर्य, विश्वास और आपसी सम्मान की जरूरत है।
चंद्रकांति आर्य, लेखिका
विवाह दो लोगों के जीवन को जोड़ने वाला रिश्ता है। इसके साथ दो परिवार भी एक-दूसरे से जुड़ते हैं। बेटी के जीवन में उसके मायके का महत्व विवाह के बाद भी कम नहीं होता। मां-बाप अपनी बेटी की चिंता करें, उसके सुख-दुख में साथ खड़े रहें और जरूरत पड़ने पर उसका सहारा बनें, यह बिल्कुल स्वाभाविक है। आखिर मां के लिए बेटी का सुख ही सबसे बड़ी खुशी होती है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब यह चिंता धीरे-धीरे जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप में बदल जाती है।
आज मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने दूरियां कम कर दी हैं। बेटी के घर में क्या हुआ, किस बात पर नाराजगी हुई और किसने क्या कहा, यह जानकारी कुछ ही मिनटों में मायके तक पहुंच जाती है। कई बार पूरी स्थिति जाने और समझे बिना दी गई सलाह समस्या को हल करने के बजाय और उलझा देती है। पति-पत्नी के बीच छोटी-छोटी बातों पर मतभेद होना असामान्य नहीं है। हर घर में कभी नाराजगी होती है, कभी विचारों का अंतर होता है और कभी कोई बात मन को ठेस पहुंचा देती है। लेकिन हर छोटी नाराजगी को बड़ी समस्या समझ लेना भी उचित नहीं है। कई बार दो लोगों को केवल थोड़ा समय, धैर्य और आपस में बैठकर बात करने की जरूरत होती है। ऐसे समय में माता-पिता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। बेटी को हर परिस्थिति में केवल विरोध करने की सलाह देने के बजाय उसे परिस्थितियों को समझने, सही और गलत में अंतर करने, धैर्य रखने और बातचीत के माध्यम से समस्या सुलझाने की सीख देना अधिक जरूरी है।
मां का प्यार बेटी के लिए दुनिया की सबसे बड़ी ताकत होता है। लेकिन यही प्यार यदि बेटी के जीवन के हर छोटे-बड़े निर्णय को प्रभावित करने लगे, तो अनजाने में बेटी के अपने रिश्ते और निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। बेटी को मजबूत बनाना और उसके हर निर्णय को अपने हाथ में लेना, इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि बेटी को गलत बात सहनी चाहिए। यदि किसी बेटी के साथ हिंसा, शोषण, गंभीर मानसिक प्रताड़ना या अन्याय हो रहा है, तो माता-पिता का उसके साथ मजबूती से खड़ा होना बेहद जरूरी है। ऐसे मामलों में चुप रहना समझदारी नहीं है। वहां परिवार का सहयोग और सही समय पर उचित कदम उठाना आवश्यक है। लेकिन सामान्य घरेलू मतभेदों और गंभीर अत्याचार के बीच अंतर समझना भी उतना ही जरूरी है।
हर छोटी बात को प्रतिष्ठा, अहंकार या अधिकार का प्रश्न बना देना किसी भी परिवार के लिए नुकसानदायक हो सकता है। रिश्तों में तुलना भी कई बार तनाव पैदा करती है। मायका और ससुराल यदि एक-दूसरे की आर्थिक स्थिति, रहन-सहन, सामाजिक प्रतिष्ठा या सुविधाओं की तुलना करने लगें, तो छोटी-सी बात भी अहंकार का कारण बन सकती है। रिश्ते इस बात से मजबूत नहीं होते कि कौन बड़ा है और कौन छोटा, बल्कि इस बात से मजबूत होते हैं कि कौन एक-दूसरे को कितना सम्मान और समझ देता है। यह जिम्मेदारी केवल मायके की नहीं है। ससुराल पक्ष को भी बहू को सम्मान, अपनापन और अपनी बात रखने का अधिकार देना चाहिए। पति को भी पत्नी की भावनाओं को समझना चाहिए और पत्नी को भी पति तथा उसके परिवार की परिस्थितियों को समझने का प्रयास करना चाहिए। रिश्ता तभी मजबूत होता है, जब दोनों तरफ से समझ और प्रयास हो।
आज जरूरत इस बात की है कि हम रिश्तों में ‘मैं’ से ज्यादा ‘हम’ को महत्व दें। हर बात में जीतने के बजाय रिश्ते को बचाने की कोशिश करें। हर छोटी समस्या को बाहर ले जाने के बजाय पहले घर के भीतर बातचीत से उसका समाधान खोजें। सलाह लेना गलत नहीं है, लेकिन हर सलाह को अंतिम निर्णय मान लेना भी उचित नहीं है।
माता-पिता का काम बच्चों के जीवन में दीवार बनना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर मजबूत सहारा बनना है। बेटी को इतना सक्षम और आत्मविश्वासी बनाना चाहिए कि वह अपने जीवन के निर्णय समझदारी से ले सके। उसे यह भरोसा होना चाहिए कि मुश्किल समय में उसका मायका उसके साथ है, लेकिन उसके जीवन का हर फैसला मायका ही करेगा, ऐसा नहीं होना चाहिए। क्योंकि घर सलाह से नहीं, विश्वास से चलता है। एक घर को बसाने में वर्षों लगते हैं। उसमें प्यार, त्याग, समझ और अनगिनत छोटी-बड़ी यादें जुड़ी होती हैं। इसलिए किसी भी रिश्ते में कदम उठाने से पहले यह सोचना जरूरी है कि हमारी बात उस घर को जोड़ रही है या तोड़ रही है।
परिवार समाज की सबसे छोटी, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। जब परिवार मजबूत होते हैं, तो समाज भी मजबूत होता है। इसलिए हमें अपने परिवार के साथ-साथ दूसरों के परिवार की भावनाओं और सम्मान को भी समझना होगा।
बेटी का मायका हमेशा उसका सहारा बना रहे, यह जरूरी है। लेकिन उसकी जिंदगी का संचालक बन जाना उचित नहीं है। उसी तरह ससुराल भी बेटी को अपनापन और सम्मान दे, उसकी स्वतंत्रता और भावनाओं का सम्मान करे। हर व्यक्ति को अपने हिस्से की जिम्मेदारी समझनी होगी। प्यार के साथ विश्वास, अधिकार के साथ जिम्मेदारी और सलाह के साथ समझदारी रखनी होगी। आखिर रिश्तों की डोर बहुत नाजुक होती है। इसे खींचने से नहीं, संभालने से मजबूती मिलती है। हर व्यक्ति ससम्मान जिए और दूसरों को भी सम्मान के साथ जीने दे—यही एक सुखी परिवार और स्वस्थ समाज की सबसे बड़ी पहचान है।
(लेखिका साहित्यक एवं समसामयिक विषयों पर लिखती हैं)