राजधानी का युवा क्यों हो रहा बेचैन?
भोपाल में बढ़ रही एंग्जायटी की समस्या, सोशल मीडिया और सफलता की दौड़ बना रही युवाओं को बेचैन;
विश्व एंग्जायटी दिवस पर विशेषज्ञों की चेतावनी- "चिंता बीमारी नहीं, लेकिन इसे नजरअंदाज करना खतरनाक"
Tropic Reporters, अंज ठाकुर, भोपाल 10 जून 2026:
तेजी से बदलती जीवनशैली, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सोशल मीडिया के प्रभाव के बीच भोपाल में एंग्जायटी (चिंता), ओवरथिंकिंग और तनाव से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। विश्व एंग्जायटी दिवस (10 जून) के अवसर पर वरिष्ठ मनोचिकित्सक डा. सत्यकांत त्रिवेदी का कहना है कि अब मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं केवल गंभीर रोगों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि विद्यार्थी, नौकरीपेशा युवा, गृहिणियां, व्यवसायी और वरिष्ठ नागरिक भी बड़ी संख्या में चिंता और तनाव की समस्या से जूझ रहे हैं।
कोविड-19 के बाद बढ़ी बीमारी
विशेषज्ञों के अनुसार कोविड-19 महामारी के बाद मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां और बढ़ी हैं। स्वास्थ्य संबंधी डर, आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक अलगाव का असर आज भी लोगों के व्यवहार में दिखाई दे रहा है। भोपाल जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र, इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं का दबाव झेल रहे किशोर, निजी क्षेत्र में कार्यरत युवा और बढ़ती महंगाई से जूझ रहे परिवार मानसिक दबाव महसूस कर रहे हैं।
अपने जीवन की तुलना दूसरों से करना
डा. त्रिवेदी बताते हैं कि सोशल मीडिया ने तुलना की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। लोग अपने जीवन की तुलना दूसरों के दिखावटी जीवन से करने लगते हैं, जिससे असंतोष और चिंता बढ़ती है। "अगर चयन नहीं हुआ तो?", "अगर मैं पीछे रह गया तो?" और "अगर भविष्य सुरक्षित नहीं हुआ तो?" जैसे विचार लगातार मन को थका देते हैं और ओवरथिंकिंग का कारण बनते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि एंग्जायटी कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि आधुनिक जीवनशैली, सामाजिक अपेक्षाओं, आर्थिक दबाव और बदलती तकनीक का संयुक्त प्रभाव है। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर खुलकर बात करना, जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह लेना और हर अनिश्चितता को खतरा न मानना बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि मानसिक रूप से स्वस्थ वही व्यक्ति है जो चिंता के बावजूद संतुलित और सार्थक जीवन जीना सीख ले।
