राहुल गांधी की राजनीति का गिरता स्तर; दिपके के समानान्तर खड़े दिख रहे:
कॉकरोच पार्टी और अभिजित दिपके के स्तर पर आए राहुल गांधी, राजनीति के निम्न स्तर पर, अब क्रेडिट लेने की होड़ शुरु;
जन्तर-मन्तर के समानांतर प्रधानमंत्री आवास के पास हाई सिक्युरिटी क्षेत्र में राहुल गांधी का प्रदर्शन
Tropic Reporters, Digital desk, नई दिल्ली/भोपाल, 22 जुलाई 2026:
देश की राजधानी दिल्ली में तथाकथित छात्र आंदोलन से अलग-थलग पड़ रहे राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर स्वयं को जीवंत दिखाने के लिए सभी मर्यादाएं तार-तार कर दीं। जबकि संसद में मॉनसून सत्र चल रहा है और तथाकथित छात्र आंदोलन के अगुआ बने अभिजीत दिपके, सौरभ दास और विजेता दहिया पिछले 20 दिनों से NEET और छात्रों की बिसात पर सोनम वांगचुक की आड़ में परोक्ष रूप से आम आदमी पार्टी, सपा और वामपंथी दलों की शह पर अपनी चाल चल रहे थे। लेकिन अब इन सभी का मुखौटा पूरी तरह से उतर चुका है। क्योंकि अब कट्टर ईमानदार से कट्टर बेईमान की छवि से दूषित हो चुके अरविन्द केजरीवाल को अब खुल कर सामने आना पड़ गया है। वास्तव में केजरीवाल को डर था कि कहीं उनकी बोई फसल को काँग्रेस, सपा या वामपंथी पार्टियां न हथिया लें। हालांकि सोनम वांगचुक के पिछले क्रियाकलाप और व्यक्तिगत हित एवं अभिरुचियां भी अब किसी से छुपे नहीं हैं।
इधर विदेश में गुमनाम छुट्टियां बिता कर लौटे राहुल गांधी को ये मुद्दा अपने हाथ से फिसलता नजर आ रहा था। अतः मुद्दे पर अपनी अहमियत बनाए रखने के उद्देश्य से राहुल गांधी ने एक जनप्रतिनिधि के रूप में समस्त मर्यादाओं को तिरोहित कर दिया और संसद में मुद्दा उठाने के स्थान पर प्रधानमंत्री आवास के पास धरना करने पहुंच गए। उद्देश्य एकदम स्पष्ट था।
हमेशा प्रधानमंत्रियों के परिवार में जन्म लेने का अहंकार पालने वाले राहुल गांधी एक प्रधानमंत्री आवास की सुरक्षा का महत्व जानते ही होंगे। परंतु सम्भवतः बार-बार चुनावों में हार से बौखलाए राहुल गांधी अब हर मर्यादा को भूल चुके हैं। इतना ही नहीं, ऐसे कदम उठाते समय वो संसद में अपने पद की गरिमा को भी ताक पर रखने से नहीं चूकते। यही कारण है कि उच्च सुरक्षा क्षेत्र होते हुए भी राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री आवास के पास प्रदर्शन करने का निर्णय लिया।
अब क्योंकि राहुल गांधी को हाई सिक्युरिटी जोन से सुरक्षाकर्मियों के द्वारा जबरदस्ती हटाया जाएगा, तो फुटेज तो जबरदस्त मिलेगी ही। लेकिन उनकी अलग फुटेज की चाहत ने उन्हें बाकी विपक्षी दलों से अलग-थलग कर दिया है।
मजेदार बात ये भी है कि अभी तक न तो राहुल गांधी, न प्रियंका वाड्रा और न ही मल्लिकार्जुन खडग़े जन्तर-मन्तर गए हैं और न ही इच्छुक दिखते हैं। कारण भी स्पष्ट है।
कॉकरोचों की पार्टी वास्तव में केजरीवाल की प्रॉक्सी है, ये सभी जान चुके हैं। केजरीवाल पहले ही खुद को INDI गठबंधन से अलग कर चुके हैं और अब राहुल गांधी के साथ कोई मंच साझा करना ही नहीं चाहते हैं। इसी तरह कई अन्य दल भी कांग्रेस से धोखा खाई हुई बैठी हैं। ताजा उदाहरण चुनाव के बाद तमिलनाडु में डीएमके और चुनाव के समय पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी हैं।
अब इसमें एक और नाम अखिलेश यादव का भी जुड़ता दिखाई दे रहा है। मंगलवार को प्रधानमंत्री आवास पर हुए नाटकीय प्रदर्शन में राहुल गांधी के साथ कन्धे से कन्धा मिलाए खड़े रहे अखिलेश यादव का NEET प्रदर्शन और धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र को लेकर अलग स्वतंत्र रुख है। अखिलेश संसद में इस विषय पर चर्चा के पक्ष में दिख रहे हैं। लेकिन एक युवराज वाली सामंती मानसिकता वाले राहुल गांधी को अपने से अलग न तो विचार सहन होते हैं न विचारधारा। यही कारण है कि बुधवार को जब लोकसभा में इस मुद्दे पर बहस की स्थिति बनी, तो काँग्रेस की ओर से के. सी. वेणुगोपाल ने अपने मुद्दे और विचार तो सदन में रख दिए, लेकिन हंगामे के चलते सदन स्थगन की घोषणा होने से अखिलेश यादव को अपनी बात कहने का अवसर ही नहीं मिला। इस पर वह भड़क गए और अध्यक्ष से भाजपा और कांग्रेस के बीच साठ-गाँठ के आरोप तक लगा दिए। मामला यहीं शांत नहीं हुआ। सदन के बाहर भी वेणुगोपाल के साथ अखिलेश की तीखी नोक-झोंक हो गई, तब धर्मेन्द्र यादव ने अखिलेश को बड़ी मुश्किल से रोका।
अन्य विपक्षी दलों के प्रमुख नेता तो पहले से ही उनके साथ मंच साझा नहीं करना चाहते। अब हालत यह हो गए हैं कि राहुल को अपना रास्ता अभिजित दिपके सरीखे मुखौटा नेता के समानान्तर चुनना पड़ रहा है। सुरक्षाकर्मियों द्वारा उन्हें टांगकर धरना स्थल से हटाया गया, तो केजरीवाल याद आ गए। वास्तव में प्रधानमंत्री आवास पर राहुल का धरना जन्तर-मन्तर के धरने से अधिक क्रेडिट जुटाने का प्रयास से अधिक कुछ था क्या? नहीं।
लेकिन कांग्रेस और राहुल गांधी का यह रवैय्या बदलता नहीं दिख रहा और यही उनकी राजनीति का स्तर गिराता जा रहा है। हर महत्तवपूर्ण चुनाव के बीच अथवा परिणाम के साथ ही राहुल गांधी की गुपचुप विदेश यात्रा पहले से ही तय रहती है। इन यात्राओं पर प्रश्न चिन्ह पहले से ही लगता रहा है। पार्टी या कार्यकर्ताओं के प्रति जिम्मेदारी से उनका कोई लेना-देना नहीं दिखाई देता है। परंतु राहुल गांधी के हर बार विदेश से लौट कर आने के बाद देश में अराजकता फैलाने वाली परिस्थितियों का बनना उनके और डीपस्टेट के देश विरोधी सम्बन्धों पर न चाहते हुए भी विश्वास करने को मजबूर करते हैं।
ऐसा नहीं है कि उन्हें पराजय का सामना सिर्फ चुनावी मैदान पर करना पड़ रहा है। पहले कर्नाटक फिर केरलम् में अपनी पसन्द के मुख्यमंत्री भी नहीं बनवा सके राहुल गांधी। सभी जानते हैं कि सिद्धारमैया और के. सी. वेणुगोपाल राहुल की पसंद रहे हैं, जबकि डी. के. शिवकुमार और व्ही. डी. सतीशन प्रियंका वाड्रा की। ये निर्णय अब पार्टी के भीतर राहुल गांधी की बदलती वास्तविक दशा को बयां करते हैं।