संसद का मॉनसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ा:
एक बार फिर मानसून सत्र में हंगामा हावी, 12 दिन की कार्यवाही हुई प्रभावित, प्रस्तुत किया जा सकता है परिसीमन विधेयक, FCRA बिल JPC को भेजने पर हो सकता है विचार;
Tropic Reporters, Digital desk, नई दिल्ली/भोपाल, 12 अगस्त 2026:
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| विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ा संसद का मॉनसून सत्र |
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| विपक्ष एवं कॉंग्रेस की संसद के प्रत्येक सत्र में गतिरोध उत्पन्न करने की नीति |
लोकसभा में इन 17 दिनों के दौरान करीब 16 घंटे 12 मिनट ही काम हुआ, जबकि राज्यसभा में 28 घंटे 30 मिनट कार्यवाही चली। सामान्य तौर पर छह घंटे प्रतिदिन की कार्यवाही के हिसाब से दोनों सदनों में करीब 102 घंटे काम होना चाहिए था। इस दौरान प्रश्नकाल भी सबसे ज्यादा प्रभावित रहा। लोकसभा में प्रश्नकाल करीब 20 मिनट ही चल पाया। इससे विपक्षी सांसदों को सरकार से सवाल पूछने का सीमित अवसर मिला।
लोकसभा में सात बिल महज 36 मिनट में पारित होने से भी कार्यवाही को लेकर सवाल उठे। औसतन प्रत्येक बिल को पारित करने में करीब पांच मिनट लगे। हालांकि कुछ बिलों पर सांसदों की ओर से संशोधन प्रस्ताव दिए गए, जिसके कारण उनकी प्रक्रिया में अधिक समय नहीं लगा। इसके अतिरिक्त, हर बार की तरह विपक्ष की बार-बार अपनी माँगे बदलने, हंगामा करने और सदन न चलने देने की आदत भी इसका बड़ा कारण रही। क्योंकि पिछले एक दशक से सरकार को घेरते-घेरते विपक्ष तथ्यों के सामने आने पर अपनी ही माँगों में खुद फंस जाने से बचने के लिए सदन ही नहीं चलने देने की रणनीति अपनाता आया है।
जस्टिस यशवंत वर्मा मामले की रिपोर्ट होगी पेश
संसद में जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से नकदी बरामदगी मामले की जांच रिपोर्ट भी पेश की जाएगी। तीन सदस्यीय जांच समिति ने 55 से अधिक गवाहों से पूछताछ की थी। समिति ने मामले में प्रथम दृष्टया आधार पाए जाने और जस्टिस वर्मा को कदाचार का दोषी मानते हुए उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की है।
हंगामे से करोड़ों रुपये के नुकसान का अनुमान
पीठासीन अधिकारी जगदंबिका पाल के अनुसार संसद की कार्यवाही पर प्रति मिनट करीब 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं। अब तक 12 दिन ऐसे रहे, जब हंगामे के कारण दोनों सदनों में काम प्रभावित रहा। इस आधार पर करीब 108 करोड़ रुपये की कार्यवाही प्रभावित होने का अनुमान जताया गया है।
FCRA बिल JPC को भेजने पर विचार
केंद्र सरकार फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने पर विचार कर सकती है। बिल लोकसभा में 25 मार्च को पेश किया गया था। इसका उद्देश्य NGO और विदेशी फंडिंग पर निगरानी बढ़ाना है। लाइसेंस रद्द होने की स्थिति में संस्था की संपत्ति के प्रबंधन के लिए नामित प्राधिकरण बनाने का भी प्रावधान है।
कांग्रेस समेत विपक्षी दल बिल के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जता रहे हैं। उनका कहना है कि इससे अल्पसंख्यक और ईसाई संस्थाओं की विदेशी फंडिंग प्रभावित हो सकती है। वहीं सरकार का कहना है कि बिल किसी धर्म विशेष को निशाना नहीं बनाता, बल्कि विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और निगरानी बढ़ाने के उद्देश्य से लाया गया है।
FCRA एक जटिल कानून है, जिसका सीधा संबंध विदेशी फंडिंग, राष्ट्रीय सुरक्षा और एनजीओ ईकोसिस्टम से है। ऐसे सरकार इस कानून को जल्दबाजी में पास करने के बजाय रणनीतिक तैयारी के साथ गहन संसदीय समीक्षा कराना चाहती है।
किसी विधेयक का JPC में जाना सुधार की वापसी नहीं, बल्कि उसे कानूनी तौर पर और मजबूत बनाने की प्रक्रिया है। इसीलिए सरकार इतने महत्वपूर्ण विधेयक को शोर और हंगामे के बीच पारित नहीं कराना चाहती है। राजनैतिक विरोध के चलते, इस विधेयक के बारे में किसी भी प्रकार का भ्रामक प्रचार विपक्ष या सोशल मीडिया द्वारा प्रसारित किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। अतः भ्रामक प्रचार से बचने के लिए सरकार इस विधेयक पर स्पष्ट चर्चा संसद के दोनों सदनों में चाहती है। इससे देशवासियों को इस विधेयक के बारे में सही एवं समस्त जानकारी मिल सकेगी। सरकार द्वारा बुधवार को लोकसभा में इसे JPC को भेजने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकता है।

