साक्षात्कार: 'बदलता युग, मातृत्व का सत्य'
युग बदल रहा है, मातृत्व का सत्य नहीं: डॉ. वृषाली ताई जोशी
29 अगस्त 2026, Tropic Reporters, संदीप सिंह, भोपाल:
आज समाज तेजी से बदल रहा है। परिवारों की संरचना बदल रही है, नई पीढ़ी डिजिटल दुनिया के बीच अपना व्यक्तित्व तलाश रही है और जीवन की प्राथमिकताएं भी बदल रही हैं। ऐसे दौर में मातृत्व की भूमिका और उसके स्वरूप पर नए सिरे से विचार करना आवश्यक हो गया है। आखिर मातृत्व के वे कौन से शाश्वत मूल्य हैं, जिन्हें समय के बदलाव के बावजूद सुरक्षित रखना जरूरी है? इन्हीं सवालों को लेकर मध्यप्रदेश प्रवास पर आई विश्व मांगल्य सभा की राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ. वृषाली ताई जोशी से विशेष बातचीत में उन्हाेंने मातृत्व, नई पीढ़ी, बच्चों की शिक्षा, संस्कार, समाज परिवर्तन और राजनीति जैसे विषयों पर उन्होंने खुलकर अपनी बात रखी।
राष्ट्रीय संगठन मंत्री, विश्व मांगल्य सभा, डॉ. वृषाली ताई जोशी
प्रश्न:- 'युगानुकूल मातृत्व’ की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
डॉ जोशी:- युगानुकूल मातृत्व में दो शब्द हैं- एक युगानुकूल और दूसरा मातृत्व। मातृत्व एक स्थिर और शाश्वत तत्व है, जबकि युग और परिस्थितियां परिवर्तनशील हैं। चुनौती यह है कि बदलते समय में मातृत्व के मूल तत्वों को कैसे जीवंत रखा जाए। यदि संस्कृति के मूल और सत्य तत्व समय के दबाव में प्रभावित होने लगें तो समाज में अस्थिरता पैदा होती है। इसलिए मातृत्व के मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए परिस्थितियों को समयानुकूल बनाना जरूरी है। विश्व मांगल्य सभा लगभग 16 वर्षों से मातृत्व के विषय पर काम कर रही है। आज की मां के सामने मौजूद चुनौतियों, जिम्मेदारियों और उसकी शक्तियों पर चिंतन के बाद हमने ‘युगानुकूल मातृत्व’ की अवधारणा को समाज के सामने रखा है।
प्रश्न:- चिकित्सा के क्षेत्र से समाज सेवा तक की आपकी यात्रा कैसे शुरू हुई?
डॉ. जोशी:- मैंने मुंबई में फिजियोथैरेपी की पढ़ाई की, लेकिन पढ़ाई पूरी होने के बाद समाज कार्य के लिए स्वयं को समर्पित करने का निर्णय लिया। बचपन से ही परिवार में ऐसा वातावरण था कि समाज के लिए कुछ करना चाहिए। मुझे हमेशा लगता था कि किसी एक व्यक्ति का दुख-दर्द कम करना महत्वपूर्ण है, लेकिन व्यापक सामाजिक परिवर्तन के लिए बड़े स्तर पर काम करना भी आवश्यक है। इसी भावना के साथ मार्गदर्शकों और स्वामी जितेंद्रनाथ महाराज के मार्गदर्शन में एक ऐसे सामाजिक कार्य की कल्पना हुई, जिसके माध्यम से व्यापक परिवर्तन लाया जा सके। वहीं से इस यात्रा की शुरुआत हुई।
प्रश्न:- भारतीय संस्कृति और शास्त्रों पर आपकी गहरी पकड़ कैसे बनी?
डॉ जोशी:- सबसे महत्वपूर्ण है- अभ्यास। जिस क्षेत्र में हम काम करने का निर्णय लेते हैं, उसका अध्ययन आवश्यक है। जब मुझे विश्व मांगल्य सभा के कार्य की जिम्मेदारी मिली, तब धर्म और संस्कृति के विषयों में मैं भी बहुत कुछ सीखने की प्रक्रिया में थी। मैंने अध्ययन शुरू किया और प्रवास के दौरान श्रीमद्भगवद्गीता का गहन अध्ययन किया। लेकिन ज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं आता। देशभर में प्रवास के दौरान हजारों लोगों से मिलने का अवसर मिलता है। अनुभवी और ज्ञानी लोगों के साथ बिताया गया समय भी बहुत कुछ सिखाता है। मेरा ज्ञान पुस्तकों के अध्ययन और लोगों के अनुभवों से प्राप्त एक संकलित यात्रा है।
प्रश्न:- आज के बच्चों और युवाओं को क्या पढ़ना चाहिए?
डॉ जोशी:- हर उम्र के बच्चों के लिए पढ़ने का अलग रोडमैप होना चाहिए। पांच से दस वर्ष की आयु तक बच्चों को महापुरुषों, संतों, समाज सुधारकों और वीर व्यक्तित्वों की प्रेरक कहानियां पढ़नी चाहिए। दस से सोलह वर्ष की उम्र में बच्चे प्रेरणा तलाशते हैं। उन्हें देश के गौरवशाली इतिहास, छत्रपति शिवाजी महाराज, अहिल्याबाई होलकर, झांसी की रानी, स्वामी विवेकानंद और देश के क्रांतिकारियों के जीवन से परिचित कराना चाहिए। सोलह से पच्चीस वर्ष की आयु में दर्शन और जीवन के गहरे विचारों का अध्ययन उपयोगी है।
मेरी आदत रही कि हर वर्ष मैं किसी एक महापुरुष को चुनती और पूरे वर्ष उनके बारे में पढ़ती थी। माता-पिता को भी बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण के लिए ऐसा रोडमैप बनाना चाहिए। इंस्ट्राग्राम यूनिवर्सिटी से आधा-अधूरा ज्ञान लेने के बजाय बच्चों में पुस्तकों को पढ़ने की आदत विकसित करना जरूरी है।
प्रश्न:- आप नई पीढ़ी और विशेषकर तथाकथित जेन-जी को किस रूप में देखती हैं?
डॉ जोशी:- नई पीढ़ी को केवल दोष देने से कोई समाधान नहीं निकलेगा। उनके भीतर अपार ऊर्जा है। महत्वपूर्ण यह है कि उस ऊर्जा को कौन और किस दिशा में ले जाता है। हर पीढ़ी अपने साथ नई चुनौतियां और नई शक्तियां लेकर आती है। हमें नई पीढ़ी की क्षमताओं को समझना होगा। पुरानी पीढ़ी के अनुभव और नई पीढ़ी की ऊर्जा का समन्वय ही समाज और राष्ट्र के विकास का रास्ता तैयार कर सकता है। पीढ़ियों को अलग करने के बजाय उनके बीच संवाद स्थापित करना आवश्यक है।
प्रश्न:- समाज में मर्यादा और शिक्षा को आप किस तरह देखती हैं?
डॉ जोशी:- समाज की व्यवस्था मर्यादाओं पर टिकी होती है। जिस भाषा और व्यवहार को हम सामान्य बना रहे हैं, उस पर विचार करने की जरूरत है। प्रकृति भी अपनी मर्यादाओं में चलती है-समुद्र अपनी सीमा में रहता है और पृथ्वी अपनी निर्धारित व्यवस्था में। केवल डिग्री होना शिक्षित होने का प्रमाण नहीं है। शिक्षा के साथ विवेक और समझ भी जरूरी है। ज्ञान यदि विवेक में परिवर्तित नहीं होता, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
प्रश्न:- आपके जीवन को किन व्यक्तित्वों ने प्रभावित किया?
डॉ जोशी:- मेरे जीवन में स्वामी विवेकानंद, छत्रपति शिवाजी महाराज, वीर सावरकर और अनेक क्रांतिकारियों का प्रभाव रहा है। मैंने मीराबाई के जीवन का भी विशेष अध्ययन किया है। वर्धा में शिक्षा प्राप्त करने के कारण विनोबा भावे और महात्मा गांधी के विचारों को समझने का अवसर मिला। परिवार का वातावरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा होने के कारण दत्तोपंत ठेंगड़ी और डॉ. हेडगेवार जैसे व्यक्तित्वों के विचारों को पढ़ने का अवसर मिला। मेरा मानना है कि अलग-अलग विचारों और महान व्यक्तित्वों के अध्ययन से व्यक्ति की दृष्टि व्यापक होती है।
प्रश्न:- क्या आपने कभी राजनीति में जाने के बारे में सोचा?
डॉ जोशी:- राजनीति में जाने का कभी गंभीर विचार नहीं आया। मेरा विश्वास सामाजिक संगठनों की शक्ति और समाज कार्य की क्षमता में अधिक है। यह मान लेना कि जनता तक पहुंचने का केवल राजनीति ही माध्यम है, सही नहीं है। राजनीति में हम मत मांगने का काम करते हैं, जबकि समाज कार्य में हम मत निर्माण करते हैं। मेरे लिए मत मांगने की अपेक्षा मत निर्माण अधिक मूलभूत कार्य है। जब समाज संगठित और जागरूक होता है तो राजनीति भी उसके विचारों और अपेक्षाओं को स्वीकार करने के लिए बाध्य होती है। राष्ट्र के समग्र उत्थान में समाजनीति का मंच बहुत महत्वपूर्ण है।
प्रश्न:- विश्व मांगल्य सभा का मूल विचार और कार्यपद्धति क्या है?
डॉ जोशी:- हमारा मूल विचार बहुत सरल है-अगर परिवार में मां अच्छी होगी तो परिवार अच्छा होगा, परिवार अच्छा होगा तो समाज अच्छा होगा और समाज अच्छा होगा तो राष्ट्र स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ेगा। संगठन की संरचना अखिल भारतीय स्तर से लेकर बस्ती स्तर तक है। हमारी मूल कार्यपद्धति ‘सदाचार सभा’ है, जो महिलाओं का मासिक मिलन है। इसमें गीत, ध्यान, प्राणायाम, खेल और धर्म, राष्ट्र, समाज, संस्कृति, परंपरा तथा मातृत्व जैसे विषयों पर चर्चा होती है। बच्चों के लिए बाल सभाएं और कॉलेज जाने वाली छात्राओं के लिए छात्र सभाएं भी आयोजित की जाती हैं।
संगठन ‘हर बच्चे को मां’ की अवधारणा के माध्यम से अनाथ और जरूरतमंद बच्चों के लिए भी काम कर रहा है। इसमें बच्चे को गोद लेना आवश्यक नहीं है, बल्कि एक महिला मातृवत संरक्षक के रूप में उससे जुड़ती है और उसके संस्कार, सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर ध्यान देती है। इसे डिस्टेंस पैरेंटिंग मॉडल के रूप में विकसित किया गया है।नागपुर में विश्व मांगल्य मेडिकल मिशन के रूप में एक पायलट प्रोजेक्ट भी चल रहा है, जिसमें चिकित्सकों के सहयोग से जरूरतमंद मरीजों तक चिकित्सा सहायता पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की जा रही है।
प्रश्न:- संगठन का अंतिम लक्ष्य क्या है?
डॉ जोशी:- संगठन के कार्य का कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता। समाज और देश जिन परिस्थितियों से गुजरेंगे, उनके समाधान के लिए समाज के साथ खड़े रहने वाले कार्यकर्ताओं का निर्माण करना ही संगठन का काम है। हमारा मंत्र है-“चरैवेति, चरैवेति”-चलते रहना, आगे बढ़ते रहना। यही हमारी साधना और तपस्या है।