मानव संग्रहालय में मिट्टी से श्री गणेश प्रतिमा निर्माण की कार्यशाला का आयोजन:

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मानव संग्रहालय में मिट्टी से श्री गणेश प्रतिमा निर्माण की कार्यशाला का आयोजन, पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक हस्तशिल्प को बढ़ावा देना है उद्देश्य, 6 सितंबर को संग्रहालय परिसर में होगी प्रशिक्षण कार्यशाला;

03 सितंबर 2026, Tropic Reporters, अपर्णा मिश्रा, भोपाल:

मानव संग्रहालय में इकोफ्रेंडली गणेशजी की मूर्ति निर्माण कार्यशाला
र्यावरण संरक्षण और पारंपरिक हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मानव संग्रहालय द्वारा 'महिला अधिकार एवं समाज कल्याण मंच' के सहयोग से आगामी 6 सितंबर 2026 (रविवार) को सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक एक दिवसीय निःशुल्क , मिट्टी से श्री गणेश प्रतिमा निर्माण प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। यह प्रशिक्षण श्यामला हिल्स स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय परिसर में आयोजित होगा।

मानव संग्रहालय के निदेशक प्रो. डाॅ. अमिताभ पांडे ने बताया कि, इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य आमजन को पर्यावरण-अनुकूल (इको-फ्रेंडली) गणेश प्रतिमा बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण देना है। 

कार्यशाला के दौरान संग्रहालय के मूर्तिकार श्री शिवम कुमार, विशेषज्ञ श्रीमती प्रेरणा शर्मा (ट्रेडिशनल आर्टिस्ट)द्वारा प्रतिभागियों को-

  • सही मिट्टी के चयन एवं उसे तैयार करने की विधि
  • प्रतिमा को सुघड़ आकार और स्वरूप देने की कला
  • प्राकृतिक रंगों से सजावट व अंतिम रूप देने के गुर सिखाए जाएंगे।

कार्यक्रम की जानकारी देते हुए मानव संग्रहालय के जन संपर्क अधिकारी हेमंत बहादुर सिंह परिहार ने मिट्टी से गणेश प्रतिमा बनाने के प्रमुख लाभ बताए, जो इस प्रकार हैं:-

  • जल स्रोतों का संरक्षण: प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) की मूर्तियां पानी में नहीं घुलतीं और महीनों तक जलाशयों को प्रदूषित करती हैं, जबकि शुद्ध मिट्टी की प्रतिमा विसर्जन के कुछ ही घंटों में जल में पूरी तरह विलीन हो जाती है।
  • जलीय जीवों की सुरक्षा: रासायनिक रंगों और PoP में मौजूद लेड, आर्सेनिक और मरकरी जैसे विषैले तत्व मछलियों व अन्य जलीय जीवों को नुकसान पहुंचाते हैं। मिट्टी और प्राकृतिक रंगों की प्रतिमा पूरी तरह हानिरहित होती है।
  • घर पर विसर्जन व पौधरोपण (सीड गणेश): मिट्टी की प्रतिमा का विसर्जन घर के किसी गमले या बाल्टी में आसानी से किया जा सकता है। इसमें बीज डालकर 'सीड गणेश' बनाया जा सकता है, जो विसर्जन के बाद एक सुंदर पौधे का रूप ले लेता है।
  • पारंपरिक व धार्मिक मान्यता: शास्त्रों के अनुसार पूजा-अर्चना के लिए प्राकृतिक पंचतत्वों (विशेषकर मिट्टी) से बनी मूर्तियां ही श्रेष्ठ और पवित्र मानी जाती हैं।

महिला अधिकार एवं समाज कल्याण मंच की वूमेन काउंसलर शिखा सिंह एवं मेघना सिंह ने बताया कि, इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य स्थानीय हुनर को बढ़ावा देना है तथा प्राकृतिक मूर्तिकला को अपनाने से स्थानीय कारीगरों, कुम्हारों , विद्यार्थियों और  महिलाओं द्वारा निर्मित पारंपरिक शिल्प को सीधा प्रोत्साहन प्रदान करना एवं पर्यावरण संरक्षण है।

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