वंदे मातरम्: कॉंग्रेस लगातार विवादों को हवा देने पर आतुर

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कांग्रेस का मुस्लिम वोट बैंक के तुष्टीकरण के लिए कोई सीमा नहीं, वंदे मातरम् विवाद से लगातार उठ रहे सवाल;

11 सितंबर 2026, Tropic Reporters, Digital desk, नई दिल्ली:

के सी वेणुगोपाल के वंदे मातरम पर विवादित बयान
स्वतन्त्रता दिवस पर कॉंग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् को विवाद में घसीटने के बाद पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए लगातार ऐसे राजनीतिक फैसले और बयान दे रही है, जो पार्टी की पुरानी छवि से अलग दिखाई देते हैं। इसी संदर्भ में जम्मू-कश्मीर कश्मीर के एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में वंदे मातरम् के पूर्ण संस्करण को लेकर कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल की टिप्पणी का हवाला दिया जा रहा है।

जम्मू-कश्मीर सीएम उमर अबदुल्ला वंदे मातरम पर राहुल गांधी के बयान से असहमत
उनके मुताबिक वंदे मातरम् के केवल उसी संस्करण को गाया जाना चाहिए, जिसे स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने स्वीकार किया था, क्योंकि पूरे गीत को गाने से सांप्रदायिक रंग दिए जाने का खतरा पैदा हो सकता है। आलोचकों का कहना है कि जब जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, उनके पिता फारूक अब्दुल्ला और पूरी कैबिनेट की मौजूदगी में वंदे मातरम् और राष्ट्रगान गाया गया और किसी तरह का विरोध सामने नहीं आया, तो कांग्रेस की यह आपत्ति सवाल खड़े करती है। इसी आधार पर इसे कांग्रेस की मुस्लिम वोटों पर राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है और दावा किया जा रहा है कि पार्टी जिस दिशा में आगे बढ़ रही है, वह समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी से भी आगे निकलती दिखाई दे रही है और कहीं-कहीं उसका राजनीतिक रुख असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति से टकराता हुआ नजर आता है।
15 अगस्त को कॉंग्रेस मुख्यालय में पूरे वंदे मातरम पर सोनिया गांधी ने विरोध किया था
इसके साथ ही कांग्रेस द्वारा वंदे मातरम् के केवल चुनिंदा छंदों को स्वीकार करने के ऐतिहासिक फैसले को भी 1937 के दौर की राजनीति से जोड़कर सवाल उठाए जा रहे हैं। दूसरी ओर, संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को लेकर भी राजनीतिक बहस छेड़ी जा रही है—ये शब्द मूल संविधान की प्रस्तावना में नहीं थे और 1976 के 42वें संविधान संशोधन के जरिए जोड़े गए थे। हालांकि इस पूरे मुद्दे में इतिहास और वर्तमान राजनीति, दोनों के तथ्यों को अलग-अलग देखना जरूरी है, क्योंकि वंदे मातरम् के आधिकारिक रूप, कांग्रेस के 1937 के निर्णय और 1976 के संविधान संशोधन के पीछे की परिस्थितियां एक जटिल ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रखती हैं।
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