दिव्यांग बच्चे तैयार कर रहे हर्बल और आर्गेनिक गुलाल

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सब्जियों से रंग लेकर होली को रंगीन बनाने की तैयारी; दिव्यांग बच्चे तैयार कर रहे हर्बल और आर्गेनिक गुलाल, फूलों और सब्जियों से निकाल रहे प्राकृतिक रंग

भोपाल:


 

 होली करीब है और शहर में रंगों की खरीदारी तेज हो गई है, लेकिन इस बार बाजार के केमिकल रंगों के बीच एक सकारात्मक बदलाव भी दिख रहा है। शहर के कुछ संस्थान सब्जियों और फूलों से हर्बल गुलाल तैयार कर रहे हैं। खास बात यह है कि इन रंगों को बनाने में बच्चे और दिव्यांग बच्चे सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। रोजाना आठ से दस किलो तक प्राकृतिक गुलाल तैयार किया जा रहा है। ये रंग त्वचा के लिए सुरक्षित हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते। सुरक्षित होली का यह प्रयास लोगों का ध्यान खींच रहा है।

सब्जियों से तैयार कर रहे रंग

शहर के परवरिश द म्यूजियम स्कूल के 12 से 15 साल के बच्चे सुरक्षित और प्राकृतिक होली के लिए हर्बल रंग तैयार कर सराहनीय पहल कर रहे हैं। काफाउंडर शिवानी घोष ने बताया कि सात दिन पहले से उनके मार्गदर्शन में रोजाना करीब दस बच्चे दो घंटे तक आर्गेनिक रंग तैयार कर रहे हैं।रंग बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह प्राकृतिक है। सबसे पहले अरारोट लिया जाता है। इसके बाद पालक का रस, कच्ची हल्दी का रस, चुकंदर का रस और पलाश के फूलों का रस तैयार किया जाता है। पलाश के फूलों को उबालकर उनका गाढ़ा रंग निकाला जाता है।इसके बाद अरारोट को छानकर अलग-अलग बर्तनों में रखा जाता है और उसमें अलग-अलग प्राकृतिक रस मिलाए जाते हैं। फिर बच्चों उन्हें अच्छे से मसलकर पाउडर जैसा तैयार करते हैं।तैयार मिश्रण को दो से तीन दिन तक तेज धूप में सुखाया जाता है, ताकि रंग पूरी तरह सूखकर हल्का और मुलायम बन जाए। सूखने के बाद इसे दोबारा छाना जाता है और हल्की खुशबू के लिए उसमें सेंट मिलाया जाता है। अंत में रंगों को पैकेट में भरकर तैयार कर लिया जाता है।इन बच्चों की यह पहल न सिर्फ पर्यावरण को सुरक्षित रखने का संदेश दे रही है, बल्कि कम उम्र में ही उन्हें आत्मनिर्भर बनने और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को समझने का अवसर भी दे रही है।

जनवरी से 20 दिव्यांग बच्चे तैयार कर रहे रंग  

शहर में इस बार होली सिर्फ रंगों की नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और समावेशन की भी कहानी भी कहेगी। निधान चाइल्ड केयर थेरेपी सेंटर एंड वोकेशनल इंक्लूसिव स्कूल की ओर से अनुश्री सरकार ने बताया कि संस्थान में जनवरी से ही हर्बल रंग बनाने की शुरुआत कर दी गई है। 14 से अधिक की उम्र के 20 दिव्यांग बच्चे रोजाना पूरे उत्साह के साथ हर्बल रंग तैयार कर रहे हैं। अब तक लगभग 70 किलो हर्बल रंग तैयार हो चुका है, जबकि 150 किलो रंग बनाने का लक्ष्य रखा गया है।इन रंगों की खास बात यह है कि इन्हें मंदिरों में चढ़े फूलों से तैयार किया जाता है। विभिन्न प्रकार का गेंदा व गुड़हल, पलाश, गुलाव जैसे फूलों को मंदिरों से एकत्रित करते हैं। इसके बाद फूलों की पंखुड़ियों को अलग करके, धूप में अच्छी तरह सुखाकर इसका पाउडर बनाकर रख लिया जाता है। यह प्रक्रिया होली से काफी पहले की जाती है। फिर होली से लगभग एक महीने पहले तैयार फूलों के पाउडर को कार्नफ्लोर के साथ तय अनुपात में मिलाते हैं। जैसे- एक किलो फूलों का पाउडर और चार किलो कार्नफ्लोर। इसके बाद जरूरत के हिसाब से इसमें फूड कलर मिलाकर हर्बल रंग तैयार किया जाता है।सबसे प्रेरणादायक पहलू यह है कि इन रंगों को बनाने की पूरी जिम्मेदारी दिव्यांग बच्चों के हाथों में होती है। वे न केवल रंग तैयार करते हैं, बल्कि पैकेजिंग तक का कार्य संभालते हैं। यह पहल उन्हें आत्मविश्वास, हुनर और आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ाने का कदम है।

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