गंभीर मानसिक बीमारी है बाइपोलर डिसऑर्डर
सिर्फ मूड स्विंग नहीं, गंभीर मानसिक बीमारी है बाइपोलर डिसऑर्डर;
प्रदेश की राजधानी में भी तेजी से बढ़ रहे मामले, युवा सबसे ज्यादा हो रहे प्रभावित
अंज ठाकुर, ट्रॉपिक रिपोर्टर, 27 मई 2026:
आज की तेज रफ्तार और तनावभरी जिंदगी में मानसिक बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इन्हीं में से एक है बाइपोलर डिसऑर्डर, जिसे लोग अक्सर सामान्य मूड स्विंग समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह एक गंभीर मानसिक रोग है, जिसमें व्यक्ति कभी अत्यधिक उत्साहित और ऊर्जावान हो जाता है तो कभी गहरे अवसाद में चला जाता है।
भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर की एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. ज्योत्सना जैन के अनुसार बाइपोलर डिसऑर्डर में दिमाग के न्यूरोकेमिकल्स जैसे डोपामिन, सेरोटोनिन और नॉरएड्रेनालिन का संतुलन बिगड़ जाता है। मैनिक फेज में डोपामिन का स्तर बढ़ जाता है, जिससे व्यक्ति में अत्यधिक ऊर्जा, आत्मविश्वास और तेजी से काम करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। वहीं डिप्रेशन के दौरान सेरोटोनिन की कमी से उदासी, निराशा और आत्मघाती विचार तक आने लगते हैं।
क्या होते हैं इसके लक्षण
मेनिया की स्थिति में मरीज बहुत ज्यादा बोलने लगता है, कम नींद लेता है, जरूरत से ज्यादा खर्च करता है और कई बार गलत फैसले भी लेने लगता है। कुछ मामलों में नशे की लत और जोखिम भरे व्यवहार भी देखने को मिलते हैं। वहीं डिप्रेशन में व्यक्ति लगातार उदास रहता है, किसी काम में मन नहीं लगता, ऊर्जा कम हो जाती है और सामाजिक रिश्तों पर भी असर पड़ने लगता है।
क्या हैं इसके कारण
विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी का कोई एक कारण नहीं होता। आनुवांशिकता, अत्यधिक तनाव, नींद की कमी, नशा, सोशल मीडिया का अधिक उपयोग और आधुनिक तनावपूर्ण जीवनशैली इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं। महिलाओं में प्रसव के बाद हार्मोनल बदलाव के कारण भी यह बीमारी देखने को मिल सकती है।
भोपाल में क्या है स्थिति
डॉ. जैन के मुताबिक भोपाल में इस बीमारी के मरीज लगातार सामने आ रहे हैं। अस्पतालों की ओपीडी में आने वाले गंभीर मानसिक रोगियों में बड़ी संख्या बाइपोलर और अन्य मूड डिसऑर्डर से प्रभावित लोगों की होती है। यह बीमारी अधिकतर युवाओं में देखने को मिलती है और इसके लक्षण आमतौर पर 20 से 30 वर्ष की उम्र के बीच शुरू हो जाते हैं।
इलाज और बचाव
विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर पहचान और सही इलाज से मरीज सामान्य जीवन जी सकता है। इलाज में मूड स्टेबलाइजर, एंटीडिप्रेसेंट और एंटीसाइकोटिक दवाओं का उपयोग किया जाता है। गंभीर मामलों में ईसीटी और काउंसलिंग की भी जरूरत पड़ सकती है।
इस बीमारी से बचाव के लिए नियमित नींद, संतुलित जीवनशैली, तनाव कम रखना, नशे से दूरी और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर खुलकर बात करना जरूरी है। डॉक्टरों का कहना है कि मानसिक बीमारी को शर्म या कमजोरी नहीं समझना चाहिए, क्योंकि समय पर मिलने वाला इलाज ही सबसे बड़ा बचाव है।
