भोजशाला विवाद सुनवाई

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"भोजशाला हिन्दू मंदिर" उच्च न्यायालय का फैसला; इतिहास, आस्था और ASI साक्ष्यों के आधार पर आया बड़ा निर्णय

98 दिन के एएसआई सर्वे के बाद आया भोजशाला पर ऐतिहासिक निर्णय

अंज ठाकुर, भोपाल, 15 मई 2026:

धार: भोजशाला मन्दिर परिसर 
लंदन संग्रहालय स्थित वाग्देवी की प्रतिमा
ध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला को हिंदू समाज मां वाग्देवी यानी मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर और शिक्षा का केंद्र मानता है। माना जाता है कि इसका निर्माण परमार वंश के राजा भोज के समय 11वीं शताब्दी में हुआ था। वहीं मुस्लिम पक्ष इस परिसर को कमाल मौला मस्जिद के रूप में मानता रहा है। इसी कारण यह मामला कई वर्षों से विवाद का विषय बना हुआ था।

ब्रिटिश काल में भी इस स्थल को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। आजादी के बाद यह परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में आया। इसके बाद यहां पूजा और नमाज को लेकर समय-समय पर प्रशासनिक व्यवस्था बनाई गई।

वर्ष 2003 में बना था पूजा-नमाज का नियम

साल 2003 में तत्कालीन केंद्र तथा मध्यप्रदेश सरकार ने भोजशाला परिसर में पूजा और नमाज को लेकर व्यवस्था तय की थी। इसके अनुसार मंगलवार को हिंदू समाज को पूजा की अनुमति दी गई, जबकि शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई। इसके अलावा बसंत पंचमी के दिन भी हिन्दू पूजन कर सकते थे। इसी व्यवस्था को लेकर लंबे समय तक विवाद और कानूनी लड़ाई चलती रही, क्योंकि कई बार बसंत पंचमी एवं शुक्रवार एक साथ पड़ने पर विवाद की स्थिति निर्मित हो जाती थी। 

2024 में हाईकोर्ट ने ASI सर्वे का दिया आदेश

भोजशाला विवाद में बड़ा मोड़ 11 मार्च 2024 को आया, जब इंदौर स्थित मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को वैज्ञानिक सर्वे करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा था कि यह जानना जरूरी है कि परिसर की मूल संरचना क्या थी और वहां पहले क्या मौजूद था।

इसके बाद एएसआई ने 22 मार्च 2024 से सर्वे का काम शुरू किया। लगभग 98 दिनों तक चले इस सर्वे में आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया। इसमें ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (GPR), 3डी मैपिंग, वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी और पुरातात्विक अध्ययन शामिल थे।

ASI ने 2024 में ही सौंप दी थी रिपोर्ट

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट 15 जुलाई 2024 को मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में पेश की। रिपोर्ट करीब 2000 से अधिक पन्नों की बताई गई थी। इसमें एएसआई ने कहा कि परिसर में मंदिर स्थापत्य से जुड़े कई प्रमाण मिले हैं।

रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि परिसर के कई स्तंभों, शिलाओं और अवशेषों पर देवी-देवताओं की आकृतियां और परमार कालीन कला शैली दिखाई देती है। एएसआई ने यह भी बताया कि वर्तमान ढांचे में प्राचीन मंदिर के हिस्सों का उपयोग किया गया है।

उच्च न्यायालय का फैसला क्यों माना जा रहा अहम?

मई 2026 में इंदौर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए भोजशाला परिसर को मां वाग्देवी मंदिर माना। अदालत ने कहा कि उपलब्ध ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य मंदिर की ओर संकेत करते हैं। साथ ही वर्ष 2003 की उस व्यवस्था को भी निरस्त कर दिया गया, जिसमें मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी गई थी।

अदालत ने अपने फैसले में एएसआई रिपोर्ट, ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरातात्विक तथ्यों को आधार बनाया। यही कारण है कि इस निर्णय को केवल धार्मिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फैसले का सकारात्मक संदेश

इस फैसले को कई लोग भारत की न्याय व्यवस्था और वैज्ञानिक जांच प्रक्रिया की मजबूती के रूप में देख रहे हैं। लंबे समय से चल रहे विवाद पर अदालत ने भावनाओं के बजाय साक्ष्यों और कानून के आधार पर निर्णय दिया। इससे यह संदेश जाता है कि ऐतिहासिक मामलों का समाधान संवैधानिक और कानूनी तरीके से संभव है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भोजशाला केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, शिक्षा और इतिहास का महत्वपूर्ण प्रतीक भी है। ऐसे में इस स्थल की ऐतिहासिक पहचान सामने आना सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। कई विशेषज्ञ इस मामले को श्री राम मंदिर के समान महत्तवपूर्ण मान रहे हैं। 

शांति और सद्भाव बनाए रखने की अपील

फैसले के बाद मुस्लिम पक्ष ने अपनी असहमति जताते हुए उच्चतम न्यायालय जाने का निर्णय लिया है प्रशासन ने लोगों से शांति और भाईचारा बनाए रखने की अपील की है। समाज के सभी वर्गों से कानून का सम्मान करने और किसी भी प्रकार की अफवाहों से दूर रहने को कहा गया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अदालत का निर्णय सर्वोपरि होता है और इसी भावना के साथ आगे बढ़ना जरूरी माना जा रहा है।

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