स्पेशल किराया, फिर भी घंटों की देरी.. यात्रियों को समय पर सफर की गारंटी कब?
स्पेशल किराया, फिर भी घंटों की देरी.. यात्रियों को समय पर सफर की गारंटी कब मिलेगी?
20-30% अधिक किराया देने के बावजूद 6 से 10 घंटे तक लेट चल रहीं कई स्पेशल ट्रेनें, कनेक्टिंग ट्रेन, फ्लाइट और जरूरी काम हो रहे प्रभावित
Tropic Reporters, अंज ठाकुर, भोपाल, 21 जुलाई 2026:
रेलवे यात्रियों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए भारतीय रेलवे समय-समय पर स्पेशल ट्रेनों का संचालन करता है, ताकि यात्रियों को कन्फर्म टिकट मिल सके और यात्रा आसान हो। लेकिन अब यही स्पेशल ट्रेनें यात्रियों के लिए राहत से ज्यादा परेशानी का कारण बनती जा रही हैं। वजह यह है कि जिन ट्रेनों में यात्री नियमित ट्रेनों से 20 से 30 प्रतिशत अधिक किराया चुका रहे हैं, वही ट्रेनें कई बार छह से 10 घंटे की देरी से यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंच रही हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब किराया विशेष है तो सेवा भी विशेष क्यों नहीं?
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| फाइल फोटो |
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| फाइल फोटो |
स्पेशल ट्रेनें 6 से 10 घंटे देरी से
पिछले कुछ दिनों में कई स्पेशल ट्रेनों की समयपालन व्यवस्था पर नजर डालने पर सामने आया कि आरकेएमपी-अगरतला स्पेशल (01665) कटनी तक 2-3 घंटे की देरी से पहुंची। पुणे-दानापुर स्पेशल (01449) लगभग 6 घंटे, मुंबई-कटिहार स्पेशल (09189) करीब 10 घंटे, जबकि मदुरई-कानपुर स्पेशल (01926) लगभग 4 घंटे की देरी से चली। इतना ही नहीं, नियमित ट्रेनों में भी जीटी एक्सप्रेस (12615) और श्रीधाम एक्सप्रेस (12192) पिछले एक सप्ताह से लगातार 2 से 3 घंटे की देरी से चल रही हैं।
लेटलतीफी का सबसे बड़ा असर यात्रियों पर
स्पेशल ट्रेनों की लेटलतीफी का सबसे बड़ा असर यात्रियों की पूरी यात्रा योजना पर पड़ता है। कई यात्रियों की कनेक्टिंग ट्रेन छूट जाती है, तो किसी की बस या फ्लाइट निकल जाती है। होटल बुकिंग बेकार हो जाती है, परीक्षा और कार्यालय समय पर नहीं पहुंच पाते। स्टेशन पर घंटों इंतजार के साथ भोजन और स्थानीय यात्रा पर अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ता है।
आधारभूत ढांचे का अनुपात लेट होने की वजह
रेलवे के जानकारों का कहना है कि मेल-एक्सप्रेस और स्पेशल ट्रेनों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन उसी अनुपात में प्लेटफार्म और पिटलाइन की संख्या नहीं बढ़ी है। परिचालन के दौरान पहले नियमित ट्रेनों को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि स्पेशल ट्रेनें सिग्नल और क्रासिंग पर अधिक देर तक रोकी जाती हैं। इसके अलावा ट्रेन यदि एक फेरे में देर से पहुंचती है तो उसके रखरखाव में 5 से 6 घंटे लगते हैं, जिससे अगली यात्रा भी देर से शुरू होती है और देरी का यह सिलसिला लगातार चलता रहता है।
"नियमित ट्रेनों की समयपालन पर रेलवे बोर्ड लगातार निगरानी रखता है, जबकि स्पेशल ट्रेनों पर अपेक्षाकृत कम फोकस होता है। जब तक रेलवे परिचालन क्षमता, प्लेटफार्म और पिटलाइन जैसी आधारभूत सुविधाओं का विस्तार नहीं करेगा, तब तक स्पेशल ट्रेनों की समयपालन व्यवस्था में सुधार करना चुनौती बना रहेगा।"
--चंद्रशेखर शर्मा, सेवानिवृत्त स्टेशन प्रबंधक, भोपाल
अब सवाल यह है कि क्या केवल कन्फर्म टिकट ही स्पेशल ट्रेन की पहचान है या फिर यात्रियों को समय पर गंतव्य तक पहुंचाना भी रेलवे की जिम्मेदारी है?

