निजी अस्पताल: रक्षक के रूप में भक्षक
बीमारियां और अस्पतालों के बिलों में मानसिक और आर्थिक रूप से मिटता आम जन: चन्द्रकांति आर्य
24 सितंबर 2026, Tropic Reporters, Digital desk, भोपाल:
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| चन्द्रकांति आर्य, लेखिका |
जब घर का कोई सदस्य अस्पताल के आईसीयू में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा हो, तब परिवार की सांसें पहले से ही अटकी होती हैं। डॉक्टर की हर एक आहट और मशीन की हर एक बीप दिल की धड़कनें बढ़ा देती है। लेकिन इस भावनात्मक कोहराम के बीच जब बाहर बिल काउंटर से कोई पर्ची आती है, तो वह किसी इंजेक्शन या दवा का पर्चा नहीं, बल्कि उस परिवार की आर्थिक अर्थी का परवाना बन जाती है। आज के दौर में प्राइवेट अस्पतालों का इलाज, बीमारी के शारीरिक कष्ट से कहीं अधिक मरीज के अपनों के मानसिक और आर्थिक दम घोंटने का जरिया बन चुका है।
एक आम मध्यमवर्गीय परिवार जब मजबूरी में किसी कॉर्पोरेट या बड़े प्राइवेट अस्पताल की दहलीज पार करता है, तो वह केवल एक मरीज को भर्ती नहीं कराता, बल्कि अपनी गाढ़ी कमाई, भविष्य के सपनों और कभी-कभी तो अपने सिर की छत को भी गिरवी रख देता है। अस्पताल में प्रवेश करते ही कागजी औपचारिकताओं के नाम पर जो खेल शुरू होता है, वह किसी डरावने सपने जैसा होता है। 'डिपॉजिट' शब्द यहां इतना क्रूर हो जाता है कि जान बचाने से पहले क्रेडिट कार्ड की लिमिट और बैंक बैलेंस की जांच होने लगती है। क्या कोई तराजू इस बात का मोल लगा सकता है कि एक तड़पते हुए पिता या मां के इलाज के लिए बेटे ने अपना आशियाना तक बेचने के कागजात पर दस्तखत कर दिए?
पारदर्शी नहीं, 'ब्लैक बॉक्स' है मेडिकल बिलिंग
प्राइवेट अस्पतालों के बिल किसी रहस्यमयी पहेली की तरह होते हैं, जिन्हें आम इंसान तो क्या, अच्छे-अच्छे चार्टर्ड अकाउंटेंट भी एक बार में नहीं समझ सकते। कॉटन के एक छोटे से टुकड़े से लेकर सुई, ग्लव्स, ग्लूट्स और सिरिंज तक, हर एक चीज पर ऐसा भारी-भरकम मुनाफा वसूला जाता है, जिसे देखकर लगता है कि अस्पताल इलाज कम और कोई बहुराष्ट्रीय शेयर बाजार चला रहे हैं।
'रिफ़्रेशमेंट चार्जेस', 'बायोमेडिकल वेस्ट फीस', 'डॉक्टर विजिटिंग फीस', जो हर डॉक्टर के कमरे में आने के दो मिनट के लिए हजारों में होती है और ऐसे न जाने कितने अदृश्य कर जोड़ दिए जाते हैं, जिन्हें देखकर मरीज का परिवार सोच में पड़ जाता है कि वह अस्पताल में इलाज करवाने आया था या किसी लग्जरी क्रूज की वीआईपी बुकिंग का भुगतान कर रहा है। दवाइयों के दाम बाजार मूल्य से दस गुना तक अधिक होते हैं। जब कोई परिवार पूछता है कि इन बेहिसाब शुल्कों का मतलब क्या है, तो सुरक्षा गार्डों और बाउंसरों की मौजूदगी में उन्हें ऐसा महसूस कराया जाता मानो वे मरीज के तीमारदार नहीं, बल्कि कोई अपराधी हों।
बीमारी के बाद शुरू कर्ज का आजीवन मर्ज
अगर चमत्कार से मरीज ठीक होकर घर लौट भी आता है, तो असली त्रासदी उसके बाद शुरू होती है। एक तरफ शरीर बीमारी से कमजोर होता है, तो दूसरी तरफ पूरा परिवार कर्ज के ऐसे दलदल में धकेल दिया जाता है जिससे बाहर निकलने में पीढ़ियां बीत जाती हैं। साहूकारों के भारी-भरकम ब्याज, दोस्तों और रिश्तेदारों से उधार मांगने की लाचारी, और भविष्य के लिए जोड़े गए सारे फंड का शून्य हो जाना, यह उस परिवार के लिए एक नए तरह का आजीवन वनवास है।
कई बार तो स्थिति इतनी भयावह हो जाती है कि लोग अपने किसी अपने की अंतिम विदाई के समय भी अंतिम संस्कार के पैसों के लिए अस्पताल के बाहर बिल चुकाने की गुहार लगाते नजर आते हैं। बिल काउंटर पर खड़े होकर गिड़गिड़ाते हुए परिजनों के आंसू अब इन अस्पतालों के एसी कमरों में बैठे प्रबंधकों के लिए केवल एक साधारण 'रेवेन्यू कलेक्शन' बनकर रह गए हैं।
समाधान के लिए जवाबदेही एवं संवेदना की जरूरत
यह स्थिति अब सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक व्यवस्था का सबसे बड़ा नैतिक पतन बन चुकी है। इस नासूर का इलाज करने के लिए कुछ कड़े और क्रांतिकारी कदम उठाने ही होंगे। हर बीमारी और प्रोसीजर के लिए प्राइवेट अस्पतालों में अधिकतम दरें तय होनी चाहिए, जिसका उल्लंघन करने पर लाइसेंस रद्दीकरण की सजा हो। अस्पताल के भीतर चलने वाली फार्मेसियों को बाहर के मेडिकल स्टोरों की तरह सामान्य दरों पर दवाएं बेचने के लिए बाध्य किया जाए, और उपभोग की गई हर सुई व रुई का स्पष्ट, तार्किक विवरण बिल में हो। हर जिले या जोन स्तर पर एक ऐसा स्वतंत्र नियामक निकाय होना चाहिए जहां मनमाने बिलों के खिलाफ मरीज या उसके परिजन तत्काल शिकायत दर्ज करा सकें और 24 घंटे के भीतर न्याय पा सकें।
अस्पताल चिकित्सा के मंदिर होने चाहिए, न कि व्यापारिक घराने। जब तक स्वास्थ्य को मुनाफे का सबसे बड़ा हथियार बनाने की इस प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक हर नागरिक इसी तरह बीमारी के दर्द से ज्यादा बिल के खौफ से मरता रहेगा। हम सभी को इस गंभीर समस्या को समझते हुए एक जुटता के साथ न्याय की मांग की आवश्यकता है।
(लेखिका साहित्यकार और समसामयिक मुद्दों पर लिखती हैं)
