IGRMS: माह का प्रादर्श 'नटियापेन-एक अप्सरा'
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में ‘माह का प्रादर्श’ श्रृंखला के अंतर्गत ‘नटियापेन – एक अप्सरा’ का हुआ अनावरण
22 सितंबर 2026, Tropic Reporters, अपर्णा मिश्रा, भोपाल:

IGRMS में माह का प्रादर्श का अनावरण
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल में आज ‘माह का प्रादर्श’ श्रृंखला के अंतर्गत संग्रहालय के वीथी संकुल स्थित इनडोर संग्रहालय भवन में सायं 4:30 बजे ‘नटियापेन – एक अप्सरा’ विशिष्ट पंचलोह प्रतिमा का अनावरण, द्वीप प्रज्वलन कर मुख्य अतिथि, 2003 बैच के आईआईएस (Indian information services) अधिकारी एवं प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) भोपाल के निदेशक श्री मनीष गौतम द्वारा किया गया। श्री मनीष गौतम का स्वागत संग्रहालय के निदेशक प्रो. अमिताभ पांडे द्वारा पुष्प गुच्छ एवं स्मृति चिह्न प्रदान कर किया गया। 
त्रिभंग मुद्रा में "नटियापेन-एक अप्सरा"
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| IGRMS निदेशक डॉ. अमिताभ पाण्डेय एवं PIB भोपाल निदेशक मनीष गौतम |
सितंबर माह के प्रादर्श में प्रदर्शनी का क्यूरेशन डॉ. सूर्य कुमार पाण्डेय, सहायक क्यूरेटर द्वारा किया गया है। डॉ. सूर्य कुमार पाण्डेय ने प्रादर्श की विशेषता बताते हुए कहा कि यह हस्तनिर्मित पंचलोह प्रतिमा शास्त्रीय चोल शैली में निर्मित एक नृत्यरत अप्सरा को दर्शाती है। प्रतिमा में अप्सरा को अलंकृत कमल आसन पर त्रिभंग मुद्रा में खड़े हुए दिखाया गया है, जिसके उठे हुए हाथ पर एक पक्षी विराजमान है। इसकी देह-भंगिमा की लयात्मक वक्रता, सूक्ष्म आभूषण, लहराते वस्त्र और शांत मुखाभिव्यक्ति इसे विशिष्ट कलात्मक सौंदर्य प्रदान करती हैं।
यह कृति वर्ष 2009 में भोपाल में आयोजित ‘शिल्पायन-II’ कलाकार कार्यशाला के दौरान संग्रहित की गई थी। यह दक्षिण भारत की समृद्ध और जीवंत धातु-शिल्प परंपरा को दर्शाती है, जहाँ चोल राजवंश (9वीं से 13वीं शताब्दी) के काल से चली आ रही इस विरासत को तमिलनाडु के पारंपरिक शिल्पकार आज भी सहेजे हुए हैं।
हाथ पर प्रेम और विरह का प्रतीक पक्षी:
प्रतिमा के हाथ पर स्थित पक्षी (शुक या सारिका) भारतीय साहित्यिक परंपरा में प्रेम, समर्पण और विरह का प्रतीक माना जाता है। यह इस बात का संकेत है कि नायिका अपनी भावनाएँ पक्षी से साझा कर रही है या उसे अपने प्रिय तक संदेश पहुँचाने का माध्यम बना रही है। इसकी तुलना कर्नाटक के बेलूर स्थित चेन्नकेशव मंदिर की ‘सुकभाषिणी’ प्रतिमा से भी की जाती है।
त्रिभंग मुद्रा की लयात्मकता:
‘नटियापेन’ की त्रिभंग मुद्रा शरीर में S-आकार की वक्रता बनाती है। दायाँ उठा हुआ पैर प्रतिमा में अद्भुत गतिशीलता और नृत्य की जीवंतता भरता है।
लॉस्ट-वैक्स (Cire Perdue) तकनीक:
इसके निर्माण में पारंपरिक मधुच्छिष्ट विधान का उपयोग किया गया है, जिसमें मोम के सूक्ष्म मॉडल को मिट्टी से ढंककर गर्म किया जाता है और पिघली हुई धातु डालकर अंतिम स्वरूप गढ़ा जाता है।
कार्यक्रम की सराहना करते हुए मुख्य अतिथि एवं पीआईबी निदेशक श्री मनीष गौतम ने ,संग्रहालय की द्वारा प्रदर्शित प्रतिमा के आर्ट एंड क्राफ्ट की प्रशंसा की और इस प्रदर्शन को प्रासंगिक और उपयोगी बताया।
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| कार्यक्रम का शुभारंभ करते IGRMS निदेशक डॉ. अमिताभ पाण्डेय |
संग्रहालय के जनसंपर्क अधिकारी श्री हेमंत बहादुर सिंह परिहार ने बताया कि दर्शक पूरे माह इस पंचधातु मूर्ति के माध्यम से चोल शैली, त्रिभंग नृत्य मुद्रा और भारतीय मूर्तिकला में पक्षियों के सांकेतिक महत्व का अवलोकन कर सकेंगे।हस्तनिर्मित यह पंचलोह प्रतिमा ‘नटियापेन – एक अप्सरा’ का उद्गम स्थल पुलियनचेरी, कुंभकोणम, तंजावुर, (तमिलनाडु) है।
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| IGRMS जनसम्पर्क अधिकारी एच. बी. एस. परिहार |
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सभी उपस्थित अतिथियों का आभार प्रदर्शन वीथि संकुल के प्रभारी अधिकारी एन सकमाचा सिंह द्वारा किया गया ।






